युवा भारत अभियान का मुख्य उद्देश्य है युवाओं का आर्थिक, सामाजिक एवं राजनीतिक सशक्तिकरण। इस बात को नजरंदाज नहीं किया जा सकता है कि यदि इस देश की युवाशक्ति को सही दिशा में व सही संकल्प के साथ उपयोग किया जाए तो देश की प्रगति का मार्ग प्रशस्त होगा।
इसी संकल्प व निश्चय के साथ इस अभियान की शुरुआत की जा रही है और क्योंकि यह अभियान आपके समर्थन से ही आगे बढ़ेगा इसलिए आपके सुझावों को हम आमंत्रित करते हैं एवं उनके महत्वपूर्ण बिंदुओं को इस अभियान में जोड़ने के लिए भी हम सदैव तत्पर हैं।
भारत एक ग्राम प्रधान देश है। आज भी देश की 65% आबादी गांवों में बसती है एवं इसमें अधिकतर आबादी युवाओं की है। आज आजादी के 75 सालों के बाद भी हमारे गांव और उनका विकास कहीं पीछे छूट गया है। आज भी देश के अधिकांश गांवों में मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं, परिणाम हम सबके सामने है। आज गांव का युवा रोजगार और अपने लिए बेहतर अवसर की तलाश में शहरों की तरफ पलायन कर रहे हैं। जिसका नतीजा यह है कि हमारे आधार हमारे गांवों का उन्नयन कहीं विलुप्त सा हो रहा है।
इन बातों को ध्यान में रखते हुए युवा भारत अभियान प्रत्येक गांव में एक खेल का मैदान एवं ई लाइब्रेरी की स्थापना की दिशा में कार्य कर रहा है।
प्रत्यक्ष रूप से 13 लाख रोजगार का सृजन एवं इनके माध्यम से अन्य ग्रामीणों को भी इसका लाभ मिल सके यह हमारा लक्ष्य है।
यदि एक निष्पक्ष दृष्टि से देश की स्थिति का अवलोकन किया जाए तो यह बात बहुत स्पष्ट रूप से सामने आती है कि वर्तमान समय में बेरोजगारी देश की कुछ सबसे बड़ी समस्याओं में से एक है।
दुर्भाग्यवश यह परिस्थिति सुधरने के बजाय और ज्यादा भयावह होती जा रही है और इस दिशा में कोई व्यापक समाधान पर चर्चा भी नहीं हो रही है।
इस दिशा में आई युवा की पहल है कि देश में एक राष्ट्रीय रोजगार आयोग का गठन हो। यह आयोग देशभर में रोजगार के नए अवसरों का सृजन करने के लिए पूरी तरह कटिबद्ध होगा और पहले से रिक्त पड़े पदों पर समय सीमा के अंदर नियुक्ति करने के लिए युद्ध स्तर पर कार्य करेगा।
आज देश में अलग-अलग क्षेत्रों व विभागों में लाखों पद रिक्त हैं परंतु उन्हें भरने की प्रक्रिया इतनी लचर और भ्रष्टाचार से ग्रसित है कि समस्या हल तो नहीं हुई अपितु और ज्यादा बढ़ गई।
हमारे संविधान निर्माताओं ने बहुत चिंतन करने के बाद शिक्षा के अधिकार को मौलिक अधिकार का दर्जा दिया। ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि शिक्षा ही हमारे भारतीय समाज की नींव है। भारत के सभी नागरिकों को शिक्षा के समान अवसर देने के लिए यह अधिकार संविधान की मूलभावना में है लेकिन वर्तमान समय में शिक्षा माफिया और भ्रष्ट तंत्र की मिलीभगत के कारण इस अधिकार का लाभ समाज के एक बहुत बड़े वर्ग को नहीं मिल पा रहा है।
यह आवश्यक है कि समाज का कोई भी वर्ग शिक्षा के इस मौलिक अधिकार से वंचित न रहे एवं सभी को यह अधिकार मिले ताकि देश को योग्य एवं जिम्मेदार नागरिक मिलें।
प्राचीन काल में नालंदा और तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालयों की तुलना में आधुनिक युग के विश्वविद्यालय की अवधारणा में एक आदर्श बदलाव आया है। भारत में कलकत्ता, बॉम्बे और मद्रास विश्वविद्यालय की स्थापना 1857 में हुई थी। औपनिवेशिक शासन के मद्देनजर नए वेतनभोगी पदों को भरने के लिए स्नातकों को तैयार करने की जरूरत थी। कहने को तो इन विश्वविद्यालयों के आदर्श वाक्य ‘ज्ञान की उन्नति’ जैसे हुआ करते थे, लेकिन वास्तविक उद्देश्य क्लर्क पैदा करना ही था। 1919 में टैगोर ने कहा था – “हमारे विश्वविद्यालय का प्राथमिक कार्य ज्ञान की रचनात्मकता होना चाहिए।”