उत्तर प्रदेश और भारत पर 2026 का डिलिमिटेशन का असर

उत्तर प्रदेश और भारत पर 2026 का डिलिमिटेशन का असर उत्तर प्रदेश का भविष्य और भारत की राजनीति का संतुलन, दोनों ही 2026...

उत्तर प्रदेश और भारत पर 2026 का डिलिमिटेशन का असर

उत्तर प्रदेश और भारत पर 2026 का डिलिमिटेशन का असर

उत्तर प्रदेश और भारत पर 2026 का डिलिमिटेशन का असर

उत्तर प्रदेश का भविष्य और भारत की राजनीति का संतुलन, दोनों ही 2026 के डिलिमिटेशन से जुड़े हुए हैं । 23 करोड़ से ज़्यादा आबादी वाला यूपी आज दुनिया के सबसे बड़े इलाक़ों में गिना जाता है, फिर भी इसकी लोकसभा सीटें 1970 के दशक से सिर्फ़ 80 पर जमी हुई हैं। 1976 में बढ़ती जनसँख्या कारण सीटें फ्रीज़ करना ज़रूरी था, लेकिन अब 2026 में यह फ़्रीज़ ख़त्म होने जा रहा है और हमें ये जानना अत्यंत ज़रूरी है कि 2026 का डिलिमिटेशन का असर उत्तर प्रदेश और भारत के के भविष्य पर क्या होगा।

क्यों ज़रूरी है डिलिमिटेशन?

उत्तर प्रदेश की जनसँख्या के अनुसार हमें आवंटित सांसद और विधायक बहुत ही कम है जिसकी वजह से इस प्रदेश के विकास पर काफी असर हुआ है। आज हमारे सामने बहुतायत समस्याएं मुँह बाए कड़ी है जैसे की रोज़गार , शिक्षा और प्रशासन के मुद्दे। इतनी समस्याओं का हल इतने कम प्रतिनिधियों को सौंपना अपने आप में एक बहुत बड़ी समस्या है और इसी वजह से आवाज़ संसद के गलियारों तक नहीं पहुँच पाती। सोचिए, आज एक यूपी सांसद औसतन 30 लाख लोगों का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि तमिलनाडु में एक सांसद पर सिर्फ़ 20 लाख लोग हैं। यह नाइंसाफ़ी है और विकास को पीछे धकेलती है।

किस तरह बदलेगा संतुलन?

अगर डिलिमिटेशन हुआ तो लोकसभा की कुल सीटें लगभग 543 से बढ़कर 1,460 हो जाएँगी और विधान सभा में 5,840 सीट हो जाएँगी । यूपी की सीटें 80 से बढ़कर 236 और विधान सभा में 403 से बढ़कर 943 हो जाएँगी। बिहार, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों को भी बड़ी संख्या में नई सीटें मिलेंगी। इससे वोट की क़ीमत बराबर होगी और हर नागरिक की आवाज़ संसद तक पहुँचेगी।

विकास पर असर

आज दक्षिण भारत जैसे कम आबादी वाले राज्यों में सांसद अपने क्षेत्र पर बेहतर ध्यान दे पाते हैं। इसलिए सड़क, स्कूल, अस्पताल सब बेहतर बने। लेकिन यूपी और बिहार जैसे बड़े राज्यों में सांसदों पर बोझ इतना ज़्यादा है कि कई ज़रूरी क्षेत्र पिछड़ जाते हैं। 1991 याद कीजिए, जब भारत को 67 टन सोना गिरवी रखना पड़ा था क्योंकि विकास असंतुलित था। परिसीमन के बिना देश के विकास पर भी बहुत असर पड़ता है। अगर सही प्रतिनिधित्व होगा तो सही नीतियाँ और सही दिशा में योजनाएँ भी बनेंगी।

युवाओं और महिलाओं की भागीदारी

1976 के बाद सीटें जमी होने से युवाओं की राजनीति में हिस्सेदारी कम हो गई। 1950 और 60 के दशक में हर तीन में से एक सांसद युवा होता था। आज ये संख्या घटकर सिर्फ़ 10% रह गई है। डिलिमिटेशन से नई सीटें बनेंगी, नए नेता उभरेंगे और राजनीति में नई ऊर्जा आएगी। इसी तरह, महिलाओं को भी सही प्रतिनिधित्व मिलेगा। आरक्षण लागू करना आसान होगा और उनकी आवाज़ मज़बूत होगी।

वंशवाद

जब सीमाएँ दशकों तक नहीं बदलतीं, तो वही परिवार बार-बार जीतते रहते हैं और राजनीति वंशवाद में बदल जाती है। डिलिमिटेशन से यह चक्र टूटेगा।

शहरी–ग्रामीण संतुलन

साथ ही, यूपी के बड़े शहर जैसे लखनऊ, कानपुर और गाज़ियाबाद अब तक कम प्रतिनिधित्व वाले रहे हैं। नई सीटों से शहरी इलाक़ों की असली समस्याओं—रोज़गार, प्रदूषण, मकान—पर ध्यान दिया जा सकेगा।

अब वक़्त है आवाज़ उठाने का

डिलिमिटेशन कोई तकनीकी बदलाव नहीं है, बल्कि लोकतंत्र को बराबरी पर खड़ा करने का मौक़ा है। यूपी के पास सबसे ज़्यादा वोटर हैं और राष्ट्रीय राजनीति पर सबसे बड़ा असर भी। अगर हमें बराबरी और न्याय चाहिए तो हमें 2026 में होने वाले डिलिमिटेशन की ज़ोरदार माँग करनी होगी।

तो आइए, iYUVA के साथ इस अभियान को आगे बढ़ाएँ और सुनिश्चित करें कि ग़ाज़ियाबाद से गोरखपुर तक, लखनऊ से ललितपुर तक हर वोट की अहमियत बराबर हो।

जय हिन्द! जय उत्तर प्रदेश!

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