सीमांकन 2026: बराबरी और लोकतंत्र की असली ताक़त

सीमांकन 2026: बराबरी और लोकतंत्र की असली ताक़त भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। लोकतंत्र की असली ताक़त क्या है?...

सीमांकन 2026: बराबरी और लोकतंत्र की असली ताक़त

सीमांकन 2026: बराबरी और लोकतंत्र की असली ताक़त

सीमांकन 2026: बराबरी और लोकतंत्र की असली ताक़त

भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। लोकतंत्र की असली ताक़त क्या है? लोक! अगर लोगों के अधिकार कमजोर हो जाएँ तो लोकतंत्र का पूरा ढाँचा हिल जाता है। यही कारण है कि ज़रूरी है हर नागरिक, हर वोटर की आवाज़ बराबर सुनी जाए चाहे आप गाँव में हों या शहर में, उत्तर में हों या दक्षिण में। इसी बराबरी को सुनिश्चित करने का तरीका है सीमांकन (Delimitation/ परिसीमन)।

क्यों ज़रूरी है सीमांकन?

आख़िरी बार असली सीमांकन 1971 की जनगणना के आधार पर हुआ था। उसके बाद 2008 में बस थोड़ी-बहुत सीमाएँ बदलीं, लेकिन लोकसभा और विधानसभा की सीटें जस की तस रहीं। पचास साल में आबादी कई गुना बढ़ी है और राज्यों में यह बढ़ोतरी असमान रही है। नतीजा यह कि एक राज्य का वोटर दूसरे राज्य के वोटर के बराबर ताकतवर नहीं रहा।

“एक व्यक्ति, एक वोट” का मतलब

संविधान कहता है हर वोट बराबर होना चाहिए। लेकिन आज ऐसा नहीं है। ज़रा आँकड़े देखिए:

  • उत्तर प्रदेश: 80 सांसद, आबादी ~22 करोड़ → 1 सांसद ~27.5 लाख लोगों के लिए
  • बिहार: 40 सांसद, आबादी ~13 करोड़ → 1 सांसद ~32.5 लाख लोगों के लिए
  • केरल: 20 सांसद, आबादी ~3.5 करोड़ → 1 सांसद ~17.5 लाख लोगों के लिए

यानी यूपी का वोटर एक सांसद तक पहुँचने के लिए लगभग 27–28 लाख लोगों के बीच दब जाता है, जबकि केरल का वोटर सिर्फ़ 17.5 लाख में। साफ है, केरल का वोट यूपी से लगभग दोगुना “कीमती” है। क्या यही लोकतंत्र है?

दुनिया से तुलना

भारत में एक सांसद ~27 लाख लोगों का प्रतिनिधि है।

  • अमेरिका: 1 सांसद ~6.5 लाख लोगों का प्रतिनिधित्व करता है।
  • ब्रिटेन: 1.07 लाख लोग प्रति सांसद।
  • जर्मनी: 1.14 लाख लोग प्रति सांसद।
  • फ्रांस: 1.15 लाख लोग प्रति सांसद।

सोचिए, ब्राज़ील की आबादी उत्तर प्रदेश जितनी है, लेकिन वहाँ संसद में 500 से ज़्यादा सदस्य हैं। यूपी से सिर्फ़ 80 सांसद दिल्ली जाते हैं। इससे साफ दिखता है कि हमारे नेताओं पर कितना बोझ है और जनता की आवाज़ कितनी कमज़ोर पड़ जाती है।

अगर सीमांकन नहीं होगा तो?
  • वोट की असमानता: दक्षिण के राज्यों को उनकी आबादी से ज़्यादा प्रतिनिधित्व, उत्तर के राज्यों को कम।
  • सांसद पर बोझ: 25–30 लाख लोगों की आवाज़ अकेला सांसद कैसे सुनेगा?
  • नीतियों की अनदेखी: यूपी, बिहार, एमपी जैसे बड़े राज्यों की ज़रूरी समस्याएँ संसद में दब जाती हैं।
  • कमज़ोर तबकों की आवाज़ दबती है जैसे कि महिलाओं की आवाज़ और उनका रुका हुआ आरक्षण भी परसीमन से संभव होगा
  • लोकतंत्र पर अविश्वास: अगर वोटर को लगे उसका वोट दूसरों से कमज़ोर है तो लोकतंत्र की नींव हिल जाएगी।
सीमांकन 2026 क्यों अहम है?

2026 के बाद सीटों पर लगी रोक खत्म हो जाएगी। यानी संसद और विधानसभाओं की सीटें नई जनगणना के हिसाब से बाँटी जाएँगी। इससे बड़े राज्यों को असली प्रतिनिधित्व मिलेगा। और सबसे बड़ी बात 2023 का महिला आरक्षण कानून तभी लागू होगा जब नई डिलिमिटेशन होगी। यानी महिलाओं का असली राजनीतिक प्रतिनिधित्व भी इसी से जुड़ा है।

iYuva की पहल

iYuva इस अभियान को आगे बढ़ा रहा है ताकि हर नागरिक समझे कि सीमांकन लोकतंत्र की बराबरी है।

  • इससे सांसद जनता के और करीब होंगे।
  • बड़े राज्यों की असली आवाज़ संसद तक पहुँचेगी।
  • हर समुदाय को सही प्रतिनिधित्व मिलेगा।
  • लोकतंत्र मज़बूत होगा।
निष्कर्ष

लोकतंत्र का मतलब है बराबरी। आज जब केरल का वोट यूपी से दोगुना ताकतवर है तो यह साफ नाइंसाफी है। सीमांकन 2026 कोई साधारण प्रक्रिया नहीं, बल्कि बराबरी लौटाने और लोकतंत्र को मज़बूत करने का अवसर है।

तो आइए, मिलकर आवाज़ उठाएँ—

सीमांकन 2026 ज़रूरी है, बराबरी ज़रूरी है, लोकतंत्र मज़बूत करना ज़रूरी है।

जय हिंद!

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