भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। लोकतंत्र की असली ताक़त क्या है? लोक! अगर लोगों के अधिकार कमजोर हो जाएँ तो लोकतंत्र का पूरा ढाँचा हिल जाता है। यही कारण है कि ज़रूरी है हर नागरिक, हर वोटर की आवाज़ बराबर सुनी जाए चाहे आप गाँव में हों या शहर में, उत्तर में हों या दक्षिण में। इसी बराबरी को सुनिश्चित करने का तरीका है सीमांकन (Delimitation/ परिसीमन)।
आख़िरी बार असली सीमांकन 1971 की जनगणना के आधार पर हुआ था। उसके बाद 2008 में बस थोड़ी-बहुत सीमाएँ बदलीं, लेकिन लोकसभा और विधानसभा की सीटें जस की तस रहीं। पचास साल में आबादी कई गुना बढ़ी है और राज्यों में यह बढ़ोतरी असमान रही है। नतीजा यह कि एक राज्य का वोटर दूसरे राज्य के वोटर के बराबर ताकतवर नहीं रहा।
संविधान कहता है हर वोट बराबर होना चाहिए। लेकिन आज ऐसा नहीं है। ज़रा आँकड़े देखिए:
यानी यूपी का वोटर एक सांसद तक पहुँचने के लिए लगभग 27–28 लाख लोगों के बीच दब जाता है, जबकि केरल का वोटर सिर्फ़ 17.5 लाख में। साफ है, केरल का वोट यूपी से लगभग दोगुना “कीमती” है। क्या यही लोकतंत्र है?
भारत में एक सांसद ~27 लाख लोगों का प्रतिनिधि है।
सोचिए, ब्राज़ील की आबादी उत्तर प्रदेश जितनी है, लेकिन वहाँ संसद में 500 से ज़्यादा सदस्य हैं। यूपी से सिर्फ़ 80 सांसद दिल्ली जाते हैं। इससे साफ दिखता है कि हमारे नेताओं पर कितना बोझ है और जनता की आवाज़ कितनी कमज़ोर पड़ जाती है।
2026 के बाद सीटों पर लगी रोक खत्म हो जाएगी। यानी संसद और विधानसभाओं की सीटें नई जनगणना के हिसाब से बाँटी जाएँगी। इससे बड़े राज्यों को असली प्रतिनिधित्व मिलेगा। और सबसे बड़ी बात 2023 का महिला आरक्षण कानून तभी लागू होगा जब नई डिलिमिटेशन होगी। यानी महिलाओं का असली राजनीतिक प्रतिनिधित्व भी इसी से जुड़ा है।
iYuva इस अभियान को आगे बढ़ा रहा है ताकि हर नागरिक समझे कि सीमांकन लोकतंत्र की बराबरी है।
लोकतंत्र का मतलब है बराबरी। आज जब केरल का वोट यूपी से दोगुना ताकतवर है तो यह साफ नाइंसाफी है। सीमांकन 2026 कोई साधारण प्रक्रिया नहीं, बल्कि बराबरी लौटाने और लोकतंत्र को मज़बूत करने का अवसर है।
तो आइए, मिलकर आवाज़ उठाएँ—
सीमांकन 2026 ज़रूरी है, बराबरी ज़रूरी है, लोकतंत्र मज़बूत करना ज़रूरी है।
जय हिंद!
कोई आइडिया है? साथ काम करना चाहते हो?