क्या हमारी आधी आबादी की आवाज़ संसद तक पहुँच रही है? क्या हमारी माँएँ, बहनें और बेटियाँ वास्तव में राजनीति और निर्णय-निर्माण की मेज़ पर बराबरी से बैठी हैं? अगर हम ईमानदारी से जवाब दें, तो आज़ादी के 75 साल बाद भी जवाब है – “नहीं।”
भारत की संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की भागीदारी हमेशा बहुत कम रही है।
यानी आधी आबादी की आवाज़ संसद और विधानसभाओं में मुश्किल से हर दस में से एक सीट तक पहुँचती है। क्या यह बराबरी है?
संसद ने हाल ही में नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023 पारित किया है। इसके तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की 33% सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। इसमें एससी और एसटी की आरक्षित सीटें भी शामिल हैं।
लेकिन ध्यान दीजिए – यह कानून तुरंत लागू नहीं होगा। इसे लागू करने के लिए ज़रूरी है कि पहले जनगणना और डिलिमिटेशन (सीटों का नया बँटवारा) हो। यह प्रक्रिया 2026 के बाद ही शुरू होगी।
डिलिमिटेशन का मतलब है – जनसंख्या के आधार पर संसद और विधानसभाओं की सीटों का नया बँटवारा।
यानी सीटें सालों से आबादी के हिसाब से कम पड़ी हुई हैं, और इसका असर सीधा महिलाओं के प्रतिनिधित्व पर भी पड़ा है।
अब सोचिए, जब सीटें बढ़ेंगी और उनमें से 33% महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी, तो तस्वीर कैसी होगी।
यह सिर्फ़ आँकड़ों का खेल नहीं है, यह एक सामाजिक क्रांति है।
अनुभव बताता है कि जब महिलाएँ राजनीति में आती हैं, तो वे सिर्फ़ कुर्सी नहीं भरतीं। वे नई सोच और संवेदनशीलता लेकर आती हैं।
महिला आरक्षण और डिलिमिटेशन मिलकर भारतीय लोकतंत्र को नई दिशा देंगे। जब संसद और विधानसभाओं में हर तीन में से एक सीट पर महिला होगी, तब असली समानता और सशक्तिकरण की शुरुआत होगी।
याद रखिए – जब महिला सशक्त होती है, तो परिवार सशक्त होता है। जब परिवार सशक्त होता है, तो समाज और देश सशक्त होता है। इसलिए यह सिर्फ़ महिलाओं की लड़ाई नहीं है, यह पूरे भारत की ताक़त बढ़ाने की लड़ाई है।
तो आइए, मिलकर इस बदलाव का स्वागत करें और कहें –
नारी शक्ति, भारत की शक्ति!
महिला सम्मान, भारत महान!
डिलिमीटेशन यानी निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्निर्धारण, भारत जैसे लोकतंत्र में अत्यंत महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। इसका उद्देश्य है – प्रत्येक नागरिक को समान प्रतिनिधित्व देना, ताकि हर वोट की कीमत बराबर हो।
आज की युवा पीढ़ी सिर्फ वोटर ही नहीं, बल्कि भविष्य के नेता, नीति निर्माता और समाज के दिशा निर्देशक भी हैं। ऐसे में यह जरूरी हो जाता है कि वे डिलिमीटेशन की प्रक्रिया को समझें और जानें कि इसका उनके क्षेत्र, प्रतिनिधित्व और विकास पर क्या प्रभाव पड़ता है।
डिलिमीटेशन से यह तय होता है कि किस क्षेत्र से कौन सा नेता चुनाव लड़ेगा, कितने लोग उस क्षेत्र में वोट डालेंगे और क्या वह क्षेत्र अनुसूचित जाति/जनजाति के लिए आरक्षित होगा या नहीं। यह सीधे तौर पर नीति निर्धारण और संसाधनों के वितरण से जुड़ा होता है।
यदि युवा जागरूक नहीं होंगे, तो वे यह नहीं समझ पाएंगे कि उनके क्षेत्र में विकास क्यों नहीं हो रहा, या उनका प्रतिनिधित्व क्यों कमजोर है। डिलिमीटेशन की जानकारी उन्हें मतदान के अधिकार का सही उपयोग करने में भी मदद करती है।
IYuva का उद्देश्य है – युवाओं को लोकतंत्र की तकनीकी प्रक्रियाओं जैसे डिलिमीटेशन, निर्वाचन, और प्रतिनिधित्व की बेहतर समझ देना, ताकि वे केवल दर्शक नहीं, बल्कि सक्रिय भागीदार बनें।
जब युवा इन बातों को समझेंगे, तभी वे राजनीति में भी भागीदारी करेंगे और देश के भविष्य को सही दिशा दे सकेंगे।
कोई आइडिया है? साथ काम करना चाहते हो?