भारत का संविधान हमें “समानता” और “न्याय” की गारंटी देता है। इसी सोच का एक अहम हिस्सा है डिलिमिटेशन (परिसीमन)—यानि जनसंख्या के हिसाब से चुनावी क्षेत्रों की सीमाएँ तय करना। यह कोई सूखा-सा कानूनी मसला नहीं है, बल्कि लोकतंत्र की असली ताक़त है।
सरल शब्दों में, डिलिमिटेशन का मतलब है यह तय करना कि हर सांसद या विधायक के हिस्से में लगभग बराबर संख्या की जनता आए। ताकि हर वोट की कीमत बराबर रहे—यही सिद्धांत है “एक व्यक्ति, एक वोट, एक समान मूल्य।”
भारत का संविधान (अनुच्छेद 82 और 170) कहता है कि हर जनगणना के बाद लोकसभा और विधानसभाओं की सीमाएँ दोबारा तय की जानी चाहिए। यह काम सरकार नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र डिलिमिटेशन कमीशन करता है, जिसकी अगुवाई सुप्रीम कोर्ट का रिटायर्ड जज करता है। इसके फैसले अंतिम होते हैं और इन्हें अदालत में भी चुनौती नहीं दी जा सकती।
आज़ादी के बाद भारत में चार बड़े परिसीमन हुए—1952, 1962, 1973 और 2002 में। हर बार जनसंख्या के हिसाब से सीटें बदलीं।
इसी तरह विधानसभाओं की सीटें भी बढ़ती रहीं—1952 में 3,102, 1963 में 3,563 और 1973 में 3,997।
आपातकाल (Emergency) के दौरान 42वाँ संशोधन लाकर लोकसभा और विधानसभाओं की कुल सीटें 2001 तक फ्रीज़ कर दी गईं। तर्क यह था कि जिन राज्यों ने जनसंख्या को काबू किया (जैसे केरल, तमिलनाडु), उन्हें सीटों का नुकसान न हो; और जिन राज्यों की जनसंख्या तेजी से बढ़ी (जैसे यूपी, बिहार), उन्हें इनाम न मिले। बाद में यह फ्रीज़ 2026 तक बढ़ा दी गई।
इस फैसले का असर आज साफ दिखता है।
इसका मतलब है कि यूपी में एक सांसद लगभग 29 लाख लोगों का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि केरल में एक सांसद सिर्फ 18 लाख लोगों का। यानी कम आबादी वाले राज्यों का वोट ज़्यादा “कीमती” हो गया—जो कि संविधान की मूल भावना के खिलाफ है।
2026 के बाद सीटों का यह फ्रीज़ खत्म होगा। यानी जनसंख्या के हिसाब से लोकसभा और विधानसभाओं की सीटें दोबारा बाँटी जाएँगी। इसका मतलब है कि उत्तर भारत के बड़े राज्यों—यूपी, बिहार, एमपी, राजस्थान—को ज्यादा सीटें मिल सकती हैं। हाँ, दक्षिण भारत के कुछ राज्यों की सीटें घट सकती हैं, लेकिन यही तो असली बराबरी है।
सिर्फ इतना ही नहीं, 2023 का महिला आरक्षण कानून भी तभी लागू होगा जब नई डिलिमिटेशन होगी। यानी महिलाओं को असली राजनीतिक प्रतिनिधित्व तभी मिलेगा जब परिसीमन होगा।
डिलिमिटेशन कोई राजनीतिक तकनिकी कदम नहीं है, यह हमारे मत की बराबरी की गारंटी है। 1976 से चला आ रहा असंतुलन अब खत्म करना ज़रूरी है। हर राज्य को उसकी असली जनसंख्या के हिसाब से प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए।
हम सबको यह समझना होगा कि लोकतंत्र तभी मजबूत होगा जब हर नागरिक की आवाज़ बराबर गिने|2026 का डिलिमिटेशनहमारे देश को सही मायने में न्यायपूर्ण और संतुलित बनाएगा।
आइए, iYuva के साथ जुड़कर इस अभियान का हिस्सा बनिए।
न्याय के लिए, संविधान के लिए, और हमारे लोकतंत्र के लिए—डिलिमिटेशन को सपोर्ट कीजिए।
जय हिंद।
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